प्रा चीन तमिलनाडु में पहाड़ियों के देश परमबूनाडु में पारी राजा थे। एक दिन वे अपने सोने के रथ पर जंगल से गुजर रहे थे। काफी गर्मी और उमस थी। राजा पारी प्यासे थे। उन्हें रास्ते में एक छोटी नदी दिखाई दी तो उन्होंने रथ रोका। अपनी प्यास बुझाने और कुछ देर आराम करने के बाद वे रथ की ओर लौटे।
वे जैसे ही रथ पर बैठने वाले थे, उन्होंने देखा कि जंगली चमेली की लता उनके रथ के पहिये से लिपट गई है। वे लता को हटाना नहीं चाहते थे। स्वर्ण रथ को वहीं छोड़ राजा घोड़ों से महल लौट गए। जैसे-जैसे समय गुजरा, लता ने पूरे रथ को ढंक दिया। लता को सहारा देता वह रथ नेक राजा की उदारता का प्रमाण बन खड़ा रहा।
इसी तरह प्राचीन तमिलनाडु में एक और राजा थे जो अपनी दया के लिए जाने जाते थे। राजा पेगन अपने बगीचे में टहल रहे थे। ठंड थी इसलिए राजा शॉल ओढ़े हुए थे। तभी उन्हें ठंड से कांपता एक मोर नजर आया। उसका कष्ट देख राजा ने अपना शॉल उतारा और मोर को ओढ़ा दिया। फिर वे महल लौट आए। इन लोगों को दया पर लिखी कविताओं में जगह मिली, जिससे आने वाली पीढ़ियां इनके बारे में जान सकीं।
लेकिन आज हम ऐसे दौर में हैं जहां स्वार्थ का बोलबाला है। लोगों को एक घायल कुत्ते को अपने कार गैराज में उसके ठीके होने तक जगह देने में भी कष्ट होता है। लेकिन जब हमें पता चलता है कि हमारी एक स्ट्रीटलाइट सिर्फ एक दिन से काम नहीं कर रही है तो हम सोशल मीडिया पर यह छींटाकशी करने में पीछे नहीं रहते कि हमारा सरकारी तंत्र कितना सुस्त है।
यही कारण है कि तमिलनाडु के शिवगंगा जिले के एक गांव की कहानी उम्मीद जगाती है, जहां पिछले 35 दिनों से स्ट्रीटलाइट नहीं चल रहीं। ऐसा इसलिए नहीं है क्योंकि नगरीय तंत्र लापरवाह है, बल्कि ग्रामीणों ने इंडियन रॉबिन चिड़िया के बच्चों को बचाने के लिए ऐसा किया, जिसने गांव के सामुदायिक स्विचबोर्ड में घोसला बना लिया था।
सेथंबर पंचायत के गांव पोथाकुडी के 20 वर्षीय कॉलेज छात्र ए. करुप्पुराजा ने देखा कि चिड़िया सामुदायिक स्विचबोर्ड में तिनके और पत्तियां भर रही है। जब उसने अंदर देखा तो उसे हरे-नीले धब्बे वाले तीन अंडे नजर आए।
उसने यह कहानी कॉमन वॉट्सएप ग्रुप पर शेयर की और ग्रुप के सदस्य सभी 35 युवा लड़कों ने एकमत होकर सहमति जताई कि चिड़िया को अंडे सेने के लिए घोसले में शांति से रहने दिया जाए और कुछ दिनों के लिए स्विचबोर्ड को न छुआ जाए। लेकिन 100 घरों को इसके लिए मनाना मुश्किल काम था। उनमें से कुछ के लिए रात में स्ट्रीट लाइट ही रोशनी का एकमात्र स्रोत थी।
लड़कों ने पूरे गांव में जाकर ग्रामीणों को स्विचबोर्ड इस्तेमाल न करने के लिए मनाया। कुछ तुंरत तैयार हो गए, जबकि कुछ ने छोटी चिड़िया के लिए लाइट बंद रखने को मूर्खता बताया। लेकिन किसी तरह लड़कों ने सभी को मना लिया।
आज चिड़िया के तीन छोटे बच्चों के छोटे-छोटे पर निकल आए हैं। और ग्रामीण धैर्य के साथ इन मेहमानों के उड़ने का इंतजार कर रहे हैं, ताकि स्ट्रीटलाइट फिर चालू कर सकें।
फंडा यह है कि नए उदाहरणों के साथ नैतिक कहानियों से बच्चों को यह भरोसा मिलता है कि दुनिया में अब भी दया है और हमेशा किसी को हमेशा कोई भौतिक वस्तु देना ही दया नहीं है।
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