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Wednesday, February 13, 2019

अगर नहीं बढ़ रहा है बच्चा ताे तुरंत लें डाॅॅॅक्टर की सलाह

लगभग सात हजार से ज्यादा बीमारियां ऐसी हैं जिन्हें दुर्लभ बीमारियोंं की श्रेणी में रखा गया है।दुर्लभ बीमारियां उन्हें माना जाता है, जो कभी-कभार ही देखने को मिलती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार ऐसी बीमारियां 10 हजार में से छह लोगों में ही देखने को मिलती हैं। इनमें से ज्यादातर बीमारियां आनुवांशिक होती हैं। इनसे ग्रसित बच्चों में से 30 प्रतिशत बच्चे 5-7 वर्ष की उम्र से पहले ही मौत का शिकार हो जाते हैं। दुर्लभ बीमारियों से ग्रसित बच्चों का मानसिक व शारीरिक विकास प्रभावित होता है। एक ही परिवार में कई लोगों को एक जैसा विकार हो सकता है। इसलिए इन दुर्लभ बीमारियों को जन्म के शीघ्र बाद ही पहचान कर इलाज करा लेना चाहिए। फिलहाल इन बीमारियों के इलाज के लिए जीन थैरेपी, एंजाइम थैरपी व स्टेम सेल ट्रीटमेंट पर शोध किया जा रहा है।

दुर्लभ बीमारियाें के प्रकार :-
गेलेक्टोसीमिया
यह एक आनुवांशिक बीमारी है जो कि गेलेक्टोसकाइनेस एंजाइम की कमी से होती है। इसमें नवजात का शरीर सामान्य शुगर को पचा नहीं पाता।
लक्षण :
दौरा आना, थकावट, वजन नहीं बढ़ना, पीलिया, उल्टी और कम खाना।
इलाज :
सोया फॉर्मूला, दूध एवं दूध से बने उत्पाद का प्रयोग बंद कर देना चाहिए।

फिनाइल किटोन यूरिया
यह एक आनुवांशिक बीमारी है। बच्चों में एंजाइम्स की कमी होने पर वह अमीनो एसिड पचा नहीं पाते और जब यह शरीर में एकत्र होता रहता है तो फिनाइल किटोन यूरिया की समस्या हो जाती है।
लक्षण :
इस बीमारी में नवजात जन्म के समय सामान्य होता है। अमीनो एसिड के जमा होने से धीरे-धीरे नवजात का विकास रुक जाता है, दिमागी कमजोरी आती है और पेशाब में गंध आने लगती है।
इलाज :
यदि इस रोग का समय रहते पता चल जाए तो बच्चे का विकास सामान्य हो सकता है। इससे बचने के लिए अमीनो एसिड रहित विशेष प्रकार का दूध दिया जाता है। यह मार्केट में आसानी से उपलब्ध होता है।

जन्मजात थायरॉइड की कमी
यह थायरॉइड हार्मोन की कमी से होती है।
लक्षण: ज्यादा सोना, पीलिया, शरीर का तापमान कम होना और थकावट आदि।
इलाज: थायरॉइड की दवाएं दी जाती हैं।

बायोटिनीडेज डेफीशियंसी
यह रोग बायोटिन (विटामिन- बी7) की कमी के कारण होता है।
लक्षण: व्यावहारिक व दिमागी क्षमता में कमी, दौरे आना, दस्त, त्वचा रोग, बार-बार संक्रमण, शारीरिक कमजोरी व बाल झड़ना।
इलाज: बायोटिन (विटामिन- बी7) दवा।

ऑसिफिकेंस प्रोगरेसिवा
इस बीमारी से ग्रस्त बच्चों में हड्डी वहां बनना शुरू हो जाती है, जहां सामान्यतया मांसपेशियां होती हैं।
लक्षण: बच्चे के शरीर के विभिन्न हिस्सों में मांसपेशियों में गांठें दिखने लगती हैं और इसकी शुरुआत कभी-कभी छोटी चोट लगने के बाद होती है। ऐसे बच्चे 30 की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते चलने-फिरने में असमर्थ हो जाते हैं और बार-बार निमोनिया से ग्रसित होते हैं।
उपचार: प्रेडनिसोलोन दवा का प्रयोग किया जाता है और बच्चे को बार-बार चोट लगने से बचाना होता है।

एकोन्ड्रोप्लेसिया
एकोन्ड्रोप्लेसिया बीमारी एक दुर्लभ बीमारी है जो 25 हजार में से किसी एक बच्चे को होती है। ऐसे बच्चों की लंबाई बहुत कम रह जाती है।
लक्षण : इन बच्चों का चेहरा बीच से छोटा व नाक चपटी होती है। इनकी रीढ़ की हड्डी ज्यादा झुकी हुई होती है। कान में बार-बार संक्रमण का खतरा रहता है और सिर में पानी भरने की आशंका भी रहती है।
उपचार : इसके इलाज के लिए जीन थैरपी व सीएनपी दवा का प्रयोग किया जा रहा है। हालांकि अभी तक इसमें सफलता नहीं मिली है।

ड्यूकन मसक्यूलर डिस्ट्रॉफी
यह मांसपेशियों की बीमारी है जो सिर्फ लड़कों में ही दिखाई देती है। इस बीमारी में एक्स क्रोमोसोम में डिस्ट्रोफिन जीन विकार हो जाता है।
लक्षण: इस रोग के लक्षण बच्चों में 2-3 साल के बाद दिखने लगते हैं। सबसे पहले पैरों की मांसपेशियां कमजोर होती हैं फिर 10 वर्ष की उम्र तक बच्चा चलना-फिरना बंद कर देता है। ऐसे बच्चों का दिमागी व सामान्य विकास भी प्रभावित होता है।
उपचार: इसके लिए स्टेम सेल या जीन थैरेपी पर प्रयोग चल रहे हैं।

पु्रन बैली सिन्ड्रोम
यह बीमारी 40 हजार में से एक बच्चे में देखने को मिलती है। यह बीमारी ज्यादातर लड़कों को होती है।
लक्षण :
इन बच्चों की मुख्य समस्या पेशाब के रास्ते में रुकावट से होती है। इनके पेट के ऊपर की मांसपेशियां पूर्णतया विकसित न होने से पेट आगे निकला होता है और इनके टेस्टीज भी पेट में होते हैं। पेशाब में रुकावट की वजह से इनको बार-बार पेशाब में संक्रमण होने का खतरा रहता है और इनके गुर्दे भी प्रभावित होते हैं।
उपचार :
इस बीमारी की मुख्य वजह सी एच आर एम 3 जीन का विकार होता है। इसके उपचार के लिए पेशाब के रास्ते की रुकावट का इलाज करना पड़ता है व टेस्टीज को पेट से नीचे लाकर उनके स्थान (स्क्रोटम) में पहुंचाना पड़ता है।

प्रोजिरिया
प्रो जिरिया में बचपन में ही बच्चा बूढ़ा दिखने लगता है। इस बीमारी की आशंका 80 लाख बच्चों में से किसी एक को होती है। यह बीमारी एलएमएनए जीन में बदलाव से होती है।
लक्षण :
जन्म के बाद इन बच्चों का वजन अपनी उम्र के अन्य बच्चों की तुलना में कम बढ़ता है और चमड़ी मोटी हो जाती है, बाल झडऩे लगते हैं, दिखना कम हो जाता है और चेहरे पर झुर्रियां पड़ जाती हैं। त्वचा के नीचे वसा व मांसपेशियां कम हो जाती हैं। ये लक्षण 6-7 साल की उम्र तक दिखने लग जाते हैं।

उपचार :
इस रोग के उपचार के लिए मोरफालिनोस लोनाफार्निब, रेपामाइसिन, ग्रोथ हार्मोन आदि दवाओं का उपयोग किया जाता है लेकिन अभी इसके इलाज में पूर्णतया सफलता नहीं मिल पाई है।

अगर बच्चे का विकास न हो रहा हो, वह ज्यादा चिड़चिड़ा रहने लगा हो, उसे दौरे आते हों, शरीर से अजीब-सी गंध आती हो, बालों के रंग में बदलाव होने लगे, देखने में परेशानी हो, उम्र के हिसाब से उसमें विकास दिखाई न दे तो फौरन डॉक्टर से संपर्क कर आवश्यक जांचें करा लेनी चाहिए।

आवश्यक जांचें कराएं
नवजात शिशुओं में दुर्लभ बीमारियों का समय रहते पता लगाने के लिए विशेष जांच प्रक्रियाएं हैं। प्रसव के बाद नवजात शिशु के शरीर से खून की कुछ बूंदें फिल्टर पेपर पर ले ली जाती हैं और कई बीमारियों के लिए टेस्ट किया जाता है। इसका प्रयोग कई दुर्लभ, आनुवांशिक एवं मेटाबॉलिक डिजीज का पता लगाने के लिए किया जाता है।

सभी नवजात बच्चों में जन्मजात थायरॉइड की कमी, कन्जानाइटल एड्रिनल हाइपरप्लेसिया, जी-6 पीडी की कमी, ग्लेक्टोसीमिया और बायोटिनीडेज की कमी की जांचें करवा लेनी चाहिए। इन सबके अलावा बच्चों में कोई भी असाधारण लक्षण देखकर तुरंत डॉक्टर की मदद लें।



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